कड़ाके की हड्डी गला देने वाली ठंडी पड़ रही थी, और साथ ही साथ थोड़ा थोड़ा कुहरा भी छाया हुआ था। धूप अभी निकलने की कोशिश ही कर रही थी, लेकिन इन सब की परवाह न करते हुए रोज की ही भाँति बब्बा का कौड़ा (लकड़ी का अलाव) जल चुका था।

नए मकान के सामने पक्की चहारदीवारी खड़ी करके जो आहाता बनाया गया है, उसमें दोनो ओर पलाश के पेड़ों पर लाला लाल फूल छा गए थे।

दिल्ली में बरसात की एक शाम कंक्रीट के जंगल पर धीरे–धीरे उतरती हुई। शाम के धीरे–धीरे उतरने की बात सुनकर आप सोचेंगे कि यह शाम भी शायद निराला की 'संध्या–सुंदरी' की भाँति होगी।

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