कभी सोचा है स्त्री भी एक पौधा ही है --
पर स्त्री को नहीं दिया जाता है इतना सत्कार ...
एक पौधे को रोपने के बाद दिया जाता ...
खाद पानी और रौशनी भी ---

और समय समय पर सहलाया जाता है प्रेम से ..
पर स्त्री एक ऐसा पौधा है
जिसे न खाद की जरूरत न पानी की और रौशनी से तो सदा दूर ही कर दिया जाता है --
स्त्री अपने आंसुओं से निकले पानी से सिंचाई करती है नई पीढ़ी की --
और खुद को खुश कर लेती है घर के अंदर बंद करके भी ..
स्त्री को उतनी भी देखभाल नहीं मिलती जितनी पौधे को --
स्त्री एक पौधे की भाँती कभी सहलाने के लिए नहीं कहती ...
पर एक पौधे की भांति ही अंकुर फुट पड़ते हैँ स्त्री के भीतर भी ...
कभी देखा है ऐसी स्त्री जिसे खुद का भी होश नहीं पर अंकुर वो भी दे जाती है ....
उफ्फफ्फ्फ़ ईश्वर ने ये कैसी लीला की है स्त्री के साथ ...
रोपा जाता है दूसरे की देहरी में और वहां भी जमा देतीं हैँ अपनी जड़े ...
सहलाये जाने की इक्षा भी करना गुनाह है उसके लिए lll


आडंबर

बंद करो मुझे पूजना देवी सा
खिलाना नौरातों मे पाँव पूजकर...
और कर देना विदा हमेशा के लिए
फिर न लेना कोई खबर ---
हाँ ये सब आडम्बर ही तो हैँ
कहते हो..अर्धांगिनी
और लेने न देते हो एक भी
निर्णय

यहाँ तक की मेरी कोख मे
पल रहे बच्चे का निर्णय भी तुम
लेते हो ---/

कहाँ हूँ मैं देवी

और कैसी देवी
जिसका करते हो हरपल ही अपमान
कभी गालियों मे खींचते हो
कभी गलियों मे चलना दूभर करते हो ---

बताओ फिर इस आडंबर का क्या है मतलब

एक ओर देवी बनाकर पूजना और देना सम्मान

अगले ही पल गाली मे घसीटकर कर देना अपमान ---

बंद करो मुझे पूजना देवी सा

खिलाना नौरातों मे पाँव पूजकर!!!