इतिहास बोध हमे हमारे समय को समझने के लिए शिक्षित करता है। हम बहुत पुराने समय को सर पर ढोने को अपना गौरव समझते है। जबकि बिल्कुल पास का समय ही हमें प्रभावित करता है।

दुनिया, विशेषकर भारत, मे पौरणिक आख्यानों ने इतिहास में नीति, विवेक, विचार, तर्क, समाज के हर क्षेत्र को समृद्ध किया। हमनें वहाँ से नायक उठाकर जीवन मे उतारे। राम, कृष्ण, अर्जुन, सुदामा, सीता, द्रोपदी, से लेकर नचिकेता, राजा हरिश्चन्द्र, भक्त प्रह्लाद तक अनेक कथानक हमारे पथ प्रदर्शक बनते रहे।

कालांतर में इन्हें समाज से निकालकर मंदिरों में सजा दिया गया। परिणामतः मूल्य विहीन समाज का निर्माण होने लगा, जो आज भी अलग अलग रूपों में जारी है।

बावजूद, इस सबके कुछेक सदियों के अंतराल से दूसरे नायक आते रहे। बुद्ध, महावीर, पाणिनि, आर्यभट्ट, पतंजलि, शंकराचार्य, चाणक्य, आदि-आदि। बाद के वर्षों में ये सब भी मठ, मत, और अनुयायी में बँटकर समाज के सरोकारों से दूर हो गए।

कईं सादिया फिर बीत गई। बीच मे इस्लाम, यहूदी, अपने अपने धार्मिक नायकों के साथ उस खाली जगह को भरने आए। उन्होंने भी मस्जिद और चर्च बनाकर अपने मूल्यों को कैद कर दिया।

पन्द्रवीं सदी के आसमान पर एक बार फिर समाज मे उजाला लेकर नानक, तुलसी, कबीर, रहीम, सूर, मीरा, जैसे कई सूर्य एक साथ उदय हुए। इसीलिये, शायद अशोक के बाद अकबर को इतिहास ने महानता का दर्जा दिया क्योकिं उसने समय को सहेजने और संवारने वाले इन मनीषियों के लिये समुचित वातावरण बनाया था।

समय का चक्र एक बार फिर घुमा। नानक, कबीर, तुलसी किताबों के रास्ते मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों में रहने लगे। समाज ने पुनः रिक्तता ओढ़ ली। बाद की तीन चार सदियां फिर से बर्बादी की वेदी पर चढ़ा दी गई।

अठारवीं- उन्नीसवीं सदी तक आते-आते घटाटोप अंधेरे के बीच राजनैतिक, शैक्षणिक, और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के चलते हमें दयानंद, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, अरविंदो, से लेकर राजा राममोहन राय, टैगोर, तिलक, गांधी सरीखे उजाले मिल गए। उनसे न केवल हम स्वत्रंत्रता का सही विचार प्राप्त कर सके, वरन सामाजिक सूचिता के मूल्यों के साथ जीने की नई ललक भी जाग गई।

आजादी के कुछेक दशक बीतते बीतते यह उजाला धूमिल पड़ने लगा। चूंकि पिछले उजाले अभी तक आंखों से ओझल नहीं हुए हैं। एक बारीक सी उम्मीद बची थी कि इनकी राख से कोई पंक्षी दुबारा पैदा हो जाएगा।

अफसोस! उस राख को फिर मंदिर -मठ-पीर-मजार- की दीवारों पर पोत दिया गया। उम्मीद पत्थरो में चिनवा दी गई। आंखों पर पट्टियां बांध दी गई। आंखे बंद होने से बाहर का अंधेरा दिखना बंद हो गया। हम सुरक्षित घरों में आभासी रोशनी कर दीपावली बना ही रहे हैं।

लेकिन इतिहास बोध पट्टियों के पार का समय पढ़ पा रहे हैं। उसे आसमान पर काली घटाएं साफ नजर आ रही हैं। दूर क्षितिज में टंगा शून्य दिख रहा है। वह जानता है कि आपको आंखें खोलकर देखना ही होगा। बिना मशाल घने जंगल मे बहुत देर तक आप अंधेरे से नहीं लड़ सकते।

इसमें राजनीति का योगदान बस इतना ही होता है कि वह नायक गढ़ने के लिए हमें औजार दे सकती है या छीन सकती है। ध्यान रहे, हथियार औजार नहीं होते हैं। वे तो औजारों को लोहा बना देते हैं।

पिछली सदी के औजार अब छीने जा रहे हैं। कंधे पर हथियार टांगे जा रहे हैं। मंदिरों के घण्टे बज रहे है। मस्जिदों से मुनादी हो रही है। महल-मठ की नीवों में नर कंकाल दबे हैं।

हम इतिहास दोहराने के मुहाने पर हैं। हम राम नहीं, राम मंदिर बना रहे हैं। बुद्ध की मुस्कान को राजा का अट्टहास बना रहे हैं। दीने-इलाही की जगह जजिया संस्कृति को नया नाम दे रहे हैं। दयानन्द होने की कोशिश को दूध में जहर मिलाकर पिला रहे हैं। हम गांधी को रोज भरी सभाओं में मारकर उसकी समाधि पर फूल चढ़ा रहे हैं। ताकि ये सब दुबारा पैदा ना हो..।

हम बर्बाद सदी के मुहाने पर खड़े हैं। किन्तु समय बाँझ नहीं होता है। वह फिर कोई गौतम, ईसा,गांधी, नानक पैदा करेगा। जो मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारों से बाहर आकर हमारे अंधेरों से लड़ेगा। उजाला फैलाएगा। पता नहीं, इस सबके लिए हमें कितनी सदियां, कितनी पीढियां, फिर से कुर्बान करनी होंगी।