
झारखंड का प्रमुख आदिवासी प्रकृति पर्व सरहुल हर साल पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार प्रकृति, पृथ्वी और सूर्य के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक माना जाता है। साल 2026 में यह पवित्र पर्व 21 मार्च (शनिवार) को मनाया जाएगा।
यह पर्व खास तौर पर झारखंड के आदिवासी समुदायों—जैसे उरांव और मुंडा—के बीच बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन साल वृक्ष की पूजा, पारंपरिक नृत्य-गीत और सामुदायिक उत्सव का आयोजन किया जाता है।
2026 में कब मनाया जाएगा सरहुल
साल 2026 में सरहुल का पर्व 21 मार्च को मनाया जाएगा। हालांकि अलग-अलग गांवों और समुदायों में इसकी तिथि में थोड़ा अंतर भी देखने को मिलता है। कई जगह यह पर्व एक ही दिन नहीं बल्कि अलग-अलग दिनों में भी मनाया जाता है।
पर्व से पहले गांवों में इसकी घोषणा की जाती है और लोग मिलकर इसकी तैयारियां शुरू कर देते हैं।
सरहुल शब्द का अर्थ और महत्व
“सरहुल” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—सर (साल वृक्ष) और हुल (उत्सव या सामूहिक आयोजन)। साल वृक्ष को प्रकृति और जीवन का प्रतीक माना जाता है।
मान्यता के अनुसार यह पर्व पृथ्वी और सूर्य के मिलन का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन लोग सरना स्थल या पवित्र वृक्ष के नीचे पूजा कर प्रकृति से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
विभिन्न जनजातियों में अलग नाम
सरहुल पर्व को अलग-अलग जनजातियों में अलग नामों से भी जाना जाता है। उरांव सरना समाज में इसे खद्दी या खेखेल बेंजा कहा जाता है। अलग-अलग समुदायों में इसकी परंपराएं थोड़ी अलग हो सकती हैं, लेकिन प्रकृति की पूजा और सामूहिक उत्सव इसकी मुख्य विशेषता है।
सरहुल पर्व की पूजा विधि
पर्व की तैयारियां लगभग एक सप्ताह पहले से शुरू हो जाती हैं। गांव के पाहन (पुजारी) इस दौरान उपवास रखते हैं।
पर्व की सुबह सूर्योदय से पहले दो नए घड़ों में पवित्र जल भरकर सरना स्थल पर अर्पित किया जाता है। इसके बाद साल वृक्ष की पूजा की जाती है और गांव की समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है। पूजा के दौरान सूर्य देव, ग्राम देवताओं और पूर्वजों को याद किया जाता है।
नृत्य, गीत और सामुदायिक उत्सव
सरहुल के दिन गांवों में उत्सव जैसा माहौल होता है। पुरुष, महिलाएं और बच्चे रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान पहनते हैं और गांव के अखड़ा में सामूहिक नृत्य करते हैं।
इस दौरान पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और चावल से बने पारंपरिक पेय हांडिया का सेवन भी किया जाता है। महिलाएं और पुरुष साल के फूलों को अपने सिर और चेहरे पर सजाकर इस प्रकृति पर्व का उत्सव मनाते हैं।
सरहुल केवल एक त्योहार ही नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, सामूहिकता और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने का प्रतीक है।