महाशिवरात्रि के अवसर पर भगवान शिव से जुड़ी कई रहस्यमयी कथाएं सुनने को मिलती हैं। इन्हीं में से एक कथा है — समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को पीने के बाद भगवान शिव को दूध पिलाने वाली उनकी ‘मां’ की।
समुद्र मंथन और हलाहल विष

पौराणिक कथा के अनुसार जब देवताओं और दानवों ने अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया, तो सबसे पहले भयानक हलाहल विष निकला। यह विष इतना घातक था कि उससे सृष्टि के विनाश का खतरा पैदा हो गया। तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को स्वयं पी लिया।
विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।
शिव को दूध पिलाने वाली मां कौन?
कथाओं के अनुसार विष की तीव्रता को शांत करने के लिए आदिशक्ति ने देवी तारा का रूप धारण किया। देवी तारा ने माता की तरह शिव को अपनी गोद में लिया और उन्हें स्तनपान कराया, जिससे विष का प्रभाव शांत हुआ। इस रूप में देवी तारा को शिव की ‘मां’ भी कहा जाता है।
देवी तारा को दस महाविद्याओं में से एक माना जाता है और उनका स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली और करुणामयी है।
महादेव श्मशान में क्यों रहते हैं?
भगवान शिव को भूतों के स्वामी और औघड़दानी कहा जाता है। उनका श्मशान में निवास करने का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है—
- वे जीवन और मृत्यु के पार हैं।
- श्मशान वैराग्य और नश्वरता का प्रतीक है।
- शिव यह संदेश देते हैं कि शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है।
- वे समाज के तिरस्कृत और उपेक्षित लोगों के भी आराध्य हैं।
श्मशान में निवास कर शिव यह बताते हैं कि वे केवल देवताओं के नहीं, बल्कि हर उस प्राणी के भगवान हैं जिसे समाज ने ठुकराया है।
आध्यात्मिक संदेश
यह कथा हमें सिखाती है कि त्याग, करुणा और मातृत्व की शक्ति सबसे बड़ी है। जब संसार संकट में पड़ा, तब शिव ने विष पिया और देवी तारा ने मां बनकर उनकी रक्षा की।
महाशिवरात्रि पर यह कथा हमें शिव और शक्ति के अद्भुत संबंध की याद दिलाती है—जहां विनाश और सृजन, त्याग और ममता, दोनों साथ-साथ चलते हैं।
