ढाका। बांग्लादेश की राजनीति की सबसे प्रभावशाली और विवादित शख्सियतों में शामिल रहीं खालिदा जिया का मंगलवार तड़के 79 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार थीं और ढाका के एवरकेयर अस्पताल में इलाज चल रहा था। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने उनके निधन की पुष्टि करते हुए कहा कि उन्होंने सुबह करीब 6 बजे अंतिम सांस ली।
खालिदा जिया के निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति का वह दौर समाप्त हो गया, जिसे पिछले तीन दशकों से “बैटलिंग बेगम्स” का युग कहा जाता था। यह दौर खालिदा जिया और उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी शेख हसीना के वर्चस्व से जुड़ा रहा।
समर्थकों में शोक की लहर

खालिदा जिया की तबीयत बिगड़ने के बाद से ही देशभर में उनके समर्थकों की चिंता बढ़ गई थी। हाल ही में BNP के एक कार्यकर्ता टीपू सुल्तान अस्पताल के बाहर यह लिखी तख्ती लेकर खड़े नजर आए थे—
“मैं बेगम खालिदा जिया को अपनी किडनी दान करना चाहता हूं।”
यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और खालिदा जिया के प्रति लोगों की भावनाओं को दर्शाता रहा। हालांकि, वह आगामी फरवरी में होने वाले आम चुनाव नहीं देख सकीं।
जन्म और शुरुआती जीवन
खालिदा जिया का जन्म 15 अगस्त 1946 को बांग्लादेश के दिनाजपुर जिले में हुआ था। उनके पिता इस्कंदर माजुमदार व्यवसाय से जुड़े थे। उन्होंने दिनाजपुर गवर्नमेंट गर्ल्स हाई स्कूल से पढ़ाई की और बाद में सुरेंद्रनाथ कॉलेज में दाखिला लिया।
राजनीति में उनका प्रवेश किसी महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि एक बड़ी त्रासदी से जुड़ा था।
पति की हत्या ने बदली जिंदगी
खालिदा जिया के पति जियाउर रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति और BNP के संस्थापक थे। 30 मई 1981 को चटगांव में एक सैन्य विद्रोह के दौरान उनकी हत्या कर दी गई। इस घटना ने खालिदा जिया की जिंदगी की दिशा ही बदल दी।
पति की मौत के बाद BNP नेतृत्व ने उन्हें राजनीति में आगे आने के लिए प्रेरित किया। उस समय देश एक बार फिर सैन्य शासन की ओर बढ़ रहा था।
सैन्य शासन के खिलाफ लोकतंत्र की लड़ाई
1982 में सेना प्रमुख हुसैन मोहम्मद इरशाद ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। इसी दौर में खालिदा जिया लोकतंत्र की सबसे मजबूत आवाज बनकर उभरीं।
उन्होंने:
- 1986 के विवादित चुनावों का बहिष्कार किया
- बार-बार गिरफ्तारी और नजरबंदी झेली
- संसद और सड़क दोनों पर सैन्य शासन का विरोध किया
उनकी इस अडिग राजनीतिक लाइन ने उन्हें लोकतंत्र समर्थकों का प्रतीक बना दिया।
बनीं बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री
1991 में सैन्य शासन के पतन के बाद हुए आम चुनाव में BNP सबसे बड़ी पार्टी बनी। सहयोगी दलों के समर्थन से खालिदा जिया ने सरकार बनाई और बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।
इसके बाद वह:
- 1991–1996
- 1996 (कुछ महीनों के लिए)
- 2001–2006
कुल तीन बार प्रधानमंत्री रहीं।
शासनकाल: विकास और विवाद दोनों
खालिदा जिया के शासनकाल में:
- आर्थिक उदारीकरण को बढ़ावा मिला
- रेडीमेड गारमेंट उद्योग का विस्तार हुआ
- लड़कियों की शिक्षा और मीडिया की स्वतंत्रता बढ़ी
- GDP ग्रोथ 7% तक पहुंची
लेकिन साथ ही:
- उर्वरक संकट और किसान आंदोलन
- राजनीतिक हिंसा
- भ्रष्टाचार के आरोप
- बेटे तारिक रहमान पर सत्ता के दुरुपयोग के आरोप
उनकी छवि को नुकसान भी पहुंचा।
2007 के बाद पतन का दौर
2007 में सेना समर्थित अंतरिम सरकार आई। इसके बाद:
- खालिदा जिया और शेख हसीना दोनों को जेल जाना पड़ा
- खालिदा जिया पर भ्रष्टाचार के मामलों में सजा हुई
- लंबे समय तक जेल और नजरबंदी में रहीं
- स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया
उन्होंने देश छोड़ने से इनकार किया और राजनीतिक संघर्ष जारी रखा।
सियासी विरासत और व्यक्तित्व
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार:
- वह कठोर लेकिन संयमित नेता थीं
- राजनीतिक भाषा में संयम बरतती थीं
- सत्ता जाने के बाद भी बदले की राजनीति से बचीं
शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद उन्होंने समर्थकों से संयम बरतने की अपील की थी।
आगे BNP का भविष्य?
खालिदा जिया के निधन के बाद BNP की कमान उनके बेटे तारिक रहमान के हाथों में है। विशेषज्ञ मानते हैं कि:
- पार्टी को नेतृत्व की बड़ी परीक्षा का सामना करना होगा
- आगामी चुनावों में जनता यह तय करेगी कि क्या वह खालिदा जिया की विरासत को आगे बढ़ाना चाहती है
खालिदा जिया सिर्फ एक नेता नहीं थीं, बल्कि बांग्लादेश के लोकतांत्रिक इतिहास का अहम अध्याय थीं।
उनका जीवन संघर्ष, सत्ता, साहस और विवाद—सबका मिश्रण रहा।
उनके निधन के साथ एक युग समाप्त हो गया, लेकिन उनकी राजनीतिक छाया आने वाले वर्षों तक बांग्लादेश की राजनीति पर बनी रहेगी।