भारतीय सिनेमा में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो समय के साथ पुरानी नहीं पड़तीं, बल्कि और ज्यादा प्रासंगिक हो जाती हैं। यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी 1975 की सुपरहिट फिल्म ‘दीवार’ उन्हीं चुनिंदा फिल्मों में से एक है। अमिताभ बच्चन का ‘विजय वर्मा’ सिर्फ एक किरदार नहीं था, बल्कि उस दौर के आम आदमी का गुस्सा, दर्द और विद्रोह था।
आज जब भारतीय सिनेमा पैन-इंडिया रिलीज, हाई-टेक VFX और ₹1000 करोड़ क्लब के दौर में पहुंच चुका है, तब यह सवाल दिलचस्प हो जाता है कि—अगर ‘दीवार’ आज यानी 2026 में रिलीज होती, तो क्या वह ‘पुष्पा’ और ‘KGF’ जैसी मेगा ब्लॉकबस्टर फिल्मों को टक्कर दे पाती?
एंग्री यंग मैन: आज के एंटी-हीरोज़ का असली ओरिजिन

आज दर्शक ग्रे शेड्स वाले किरदारों को हाथों-हाथ लेते हैं। ‘KGF’ का रॉकी भाई और ‘पुष्पा’ का पुष्पराज—दोनों सिस्टम को चुनौती देते हैं, कानून तोड़ते हैं और अपनी शर्तों पर जीते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इन सभी किरदारों की जड़ें कहीं न कहीं अमिताभ बच्चन के ‘विजय’ में ही मिलती हैं।
विजय सिर्फ एक अपराधी नहीं था, वह उस समाज के खिलाफ खड़ा आदमी था जिसने उसके पिता को चोर कहा और पूरे परिवार को तिरस्कृत किया। यही वजह है कि आज का युवा भी विजय के दर्द और उसके तेवर से खुद को जोड़ पाता।
डायलॉग्स जो आज सोशल मीडिया पर आग लगा देते
“मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता”
“आज मेरे पास बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है… तुम्हारे पास क्या है?”
अगर ये डायलॉग 2026 में रिलीज होते, तो मिनटों में X (Twitter), Instagram और YouTube पर ट्रेंड करने लगते। मीम्स, रील्स और शॉर्ट वीडियो के दौर में ‘दीवार’ की लोकप्रियता कई गुना तेजी से फैलती।
बॉक्स ऑफिस एनालिसिस: आंकड़े क्या कहते हैं?
1975 में ‘दीवार’ ने करीब ₹7.5 करोड़ की कमाई की थी, जो उस समय बड़ी ब्लॉकबस्टर मानी जाती थी। अगर औसतन 7–8% सालाना महंगाई दर को ध्यान में रखा जाए, तो 1975 का ₹1 करोड़ आज 2026 में लगभग ₹80–90 करोड़ के बराबर बैठता है।
इस हिसाब से सिर्फ महंगाई को जोड़कर देखें, तो ‘दीवार’ की वैल्यू आज के समय में करीब ₹700–800 करोड़ होती।
अब अगर इसमें आज के फैक्टर्स जोड़ें—
- औसत टिकट प्राइस: ₹250–400
- स्क्रीन काउंट: 10,000+
- पैन-इंडिया डब वर्ज़न
- ओवरसीज मार्केट की मजबूत हिस्सेदारी
तो यह फिल्म आराम से ₹900–1000 करोड़ क्लब में पहुंच सकती थी।
मां का इमोशन: पुष्पा और KGF से भी मजबूत

‘पुष्पा’ और ‘KGF’ की सफलता का सबसे बड़ा कारण मां से जुड़ा इमोशन रहा है। लेकिन इस इमोशन की नींव दशकों पहले ‘दीवार’ ने रख दी थी।
शशि कपूर का अमर डायलॉग—
“मेरे पास एक मां है”
आज भी दर्शकों की भावनाओं को झकझोर देता है। अगर यही सीन 2026 में मॉडर्न सिनेमैटोग्राफी और इमोशनल बैकग्राउंड स्कोर के साथ आता, तो उसका असर कहीं ज्यादा गहरा होता।
मॉडर्न ट्रीटमेंट में ‘दीवार’ कितनी खतरनाक होती?

अगर ‘दीवार’ को आज के दौर में—
- रॉ और रियलिस्टिक एक्शन
- इंटरनेशनल स्टंट डिजाइन
- Dolby Atmos साउंड
- हाई-एंड कैमरा वर्क
के साथ बनाया जाता, तो अमिताभ बच्चन की स्क्रीन प्रेजेंस आज के किसी भी पैन-इंडिया सुपरस्टार को कड़ी चुनौती देती।
क्यों आज भी ‘दीवार’ एक आइकॉन है?
‘दीवार’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि सही-गलत के बीच फंसे इंसान की कहानी है। यही वजह है कि 50 साल बाद भी इसका कंटेंट आज के दर्शकों को उतना ही प्रासंगिक लगता है।