
फिल्मों में हीरो जितना जरूरी होता है, उतना ही जरूरी होता है उसका विलेन। कई बार कहानी हीरो की वजह से नहीं, बल्कि खलनायक की वजह से याद रह जाती है। धुरंधर की पहली किस्त में यही हुआ था। वहां रहमान डकैत जैसा किरदार सामने आया, जिसने सिर्फ स्क्रीन पर ही नहीं, दर्शकों के दिमाग में भी अपनी जगह बना ली। लेकिन जब धुरंधर 2 में मेजर इकबाल की एंट्री हुई, तो उम्मीदें काफी बड़ी थीं। लुक, प्रेजेंस और इंटेंसिटी सबकुछ होने के बावजूद, यह किरदार वैसा असर नहीं छोड़ पाया जैसा पहले पार्ट का विलेन छोड़ गया था।
सवाल यही है आखिर ऐसा क्यों हुआ?
डर पैदा करने में सबसे अहम होती है बिल्डअप
किसी भी बड़े विलेन को यादगार बनाने के लिए सिर्फ उसका स्क्रीन पर दिखना काफी नहीं होता। उससे पहले उसका डर, उसका नाम और उसकी मौजूदगी कहानी में महसूस होनी चाहिए। रहमान डकैत के साथ यही हुआ था। उसके आने से पहले ही कहानी ने यह यकीन दिला दिया था कि वह कोई आम खलनायक नहीं है। उसके बारे में सुनते ही माहौल बदल जाता था। उसके नाम में ही एक खौफ था।
यही वजह थी कि जब वह स्क्रीन पर आया, तो उसका असर दोगुना महसूस हुआ। वह सिर्फ एक बुरा आदमी नहीं लगा, बल्कि कहानी की असली ताकत जैसा दिखा।
मेजर इकबाल की एंट्री दमदार, लेकिन असर अधूरा
धुरंधर 2 में मेजर इकबाल की एंट्री जरूर स्टाइलिश और भारी-भरकम अंदाज में होती है। किरदार को देखकर लगता है कि यह कहानी में बड़ा मोड़ लाने वाला है। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, वैसा दबदबा बन नहीं पाता।
समस्या यह नहीं लगती कि किरदार में पोटेंशियल नहीं था। असली कमी यह है कि कहानी ने उसे उतना स्पेस ही नहीं दिया, जितना एक मजबूत विलेन को मिलना चाहिए। दर्शक उसके इरादों को समझने से पहले ही अगले सीन पर पहुंच जाते हैं। उसका खतरा महसूस होने से पहले ही उसका प्रभाव कम होने लगता है।
अर्जुन रामपाल ने कोशिश की, लेकिन स्क्रिप्ट साथ नहीं दे पाई
अगर एक्टिंग की बात करें, तो अर्जुन रामपाल ने अपने हिस्से की मेहनत साफ दिखाई है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस, आंखों का एक्सप्रेशन, बॉडी लैंग्वेज और डायलॉग डिलीवरी में वह ठहराव है, जो एक खतरनाक किरदार को चाहिए होता है।
लेकिन फिल्मों में सिर्फ एक्टर की मेहनत काफी नहीं होती। अगर राइटिंग कमजोर हो, तो सबसे दमदार चेहरा भी लंबे समय तक असर नहीं छोड़ पाता। मेजर इकबाल के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। वह दिखते तो खतरनाक हैं, लेकिन कहानी उन्हें महसूस कराने में चूक जाती है।
रहमान डकैत सिर्फ विलेन नहीं, कहानी का साया था
पहले पार्ट का सबसे बड़ा प्लस यही था कि रहमान डकैत सिर्फ एक कैरेक्टर नहीं था, बल्कि पूरी कहानी पर उसका साया था। उसके फैसले, उसकी हिंसा, उसकी मौजूदगी — सब कुछ कहानी की रफ्तार तय करता था। दर्शकों को लगता था कि हीरो के सामने सच में कोई बड़ा खतरा खड़ा है।
वहीं मेजर इकबाल का किरदार कहानी में मौजूद तो है, लेकिन उसका असर उतना गहरा नहीं बैठता। वह कहानी का केंद्र बनने के बजाय, कई बार सिर्फ एक प्लॉट एलिमेंट बनकर रह जाता है।
विलेन तभी याद रहता है, जब उसके पास सिर्फ ताकत नहीं, परतें भी हों
दर्शकों को आज सिर्फ गुस्सैल या हिंसक विलेन नहीं चाहिए। उन्हें ऐसा किरदार चाहिए, जिसकी सोच, पागलपन, दर्द या मकसद भी समझ आए। रहमान डकैत में यह परतें थीं। इसीलिए वह याद रह गया।
मेजर इकबाल के साथ दिक्कत यह रही कि उसका किरदार ज्यादा गहराई नहीं पकड़ पाया। उसके पास अंदाज था, लेकिन अंदर की आग उतनी साफ नहीं दिखी। और जब विलेन के भीतर की परतें नहीं खुलतीं, तो उसका डर भी आधा रह जाता है।
असल कमी एक्टिंग में नहीं, लेखन में है
अगर पूरी तुलना को एक लाइन में कहा जाए, तो बात बहुत साफ है।
धुरंधर 2 का विलेन कमजोर इसलिए नहीं लगा क्योंकि एक्टर कमजोर था, बल्कि इसलिए क्योंकि किरदार उतनी मजबूती से लिखा ही नहीं गया।
यही वजह है कि मेजर इकबाल, तमाम स्टाइल और स्क्रीन प्रेजेंस के बावजूद, रहमान डकैत जैसी छाप नहीं छोड़ पाते। दर्शक उन्हें देखते हैं, लेकिन वैसा महसूस नहीं कर पाते, जैसा पहले पार्ट के विलेन के साथ हुआ था।
किसी भी फिल्म में यादगार विलेन बनाना आसान नहीं होता। उसके लिए सिर्फ लुक, गुस्सा और हथियार काफी नहीं होते। उसे कहानी का वजन भी चाहिए होता है। धुरंधर 2 में मेजर इकबाल के पास चेहरा था, अंदाज था, लेकिन वह मजबूत लेखन नहीं था जो उन्हें लंबे समय तक यादगार बना सके।
और शायद यही वजह है कि फिल्म देखने के बाद भी दर्शकों के दिमाग में एक ही तुलना घूमती रहती है।
रहमान डकैत वाला डर… इस बार क्यों नहीं आया?