
Suvendu Adhikari के पश्चिम बंगाल के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बनने के साथ ही राज्य की राजनीति में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया। Rashtriya Swayamsevak Sangh और भाजपा के लिए यह सिर्फ चुनावी जीत नहीं, बल्कि 75 वर्षों की लंबी वैचारिक और संगठनात्मक यात्रा का परिणाम माना जा रहा है।
रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती के दिन शुभेंदु अधिकारी का शपथ ग्रहण भाजपा समर्थकों के लिए प्रतीकात्मक जीत बन गया। कभी बंगाल में महज 4 फीसदी वोट शेयर पर सिमटी भाजपा ने 2026 विधानसभा चुनाव में 45.8 फीसदी वोट हासिल कर सत्ता तक का सफर तय किया।
विभाजन के दौर से शुरू हुई जमीन
बंगाल में संघ की जड़ें आज की राजनीति से कहीं पुरानी मानी जाती हैं। भारत विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों के बीच राहत कार्यों के जरिए संघ ने अपनी सामाजिक पकड़ मजबूत की। सीमावर्ती जिलों में बने यही नेटवर्क आगे चलकर भाजपा के मजबूत जनाधार में बदले।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी बने सबसे बड़ा चेहरा
1951 में भारतीय जनसंघ के संस्थापक Syama Prasad Mukherjee को बंगाल की राजनीति में राष्ट्रवादी बंगाली नेता के रूप में स्थापित किया गया। इससे भाजपा को “बाहरी पार्टी” की छवि से बाहर निकलने में मदद मिली।
वामपंथ के पतन के बाद खुला रास्ता
1977 से 2011 तक बंगाल में वामपंथी राजनीति का दबदबा रहा। लेकिन जैसे-जैसे लेफ्ट कमजोर हुआ, संघ और भाजपा ने गांव-गांव बूथ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी। बंगाली भाषा, स्थानीय संस्कृति और क्षेत्रीय मुद्दों के जरिए संगठन ने अपनी पहुंच बढ़ाई।
बूथ मैनेजमेंट बना सबसे बड़ा हथियार
उत्तर बंगाल से लेकर औद्योगिक इलाकों तक हजारों स्वयंसेवकों ने बिना प्रचार के लगातार काम किया। असंतुष्ट नेताओं और स्थानीय प्रभावशाली चेहरों को जोड़कर भाजपा ने अपना नेटवर्क मजबूत किया।
मोदी-शाह फैक्टर ने बदला माहौल
Narendra Modi और Amit Shah की आक्रामक रैलियों ने चुनावी माहौल को पूरी तरह बदल दिया। भाजपा ने CAA, सीमा सुरक्षा, महिलाओं की सुरक्षा, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया।
मतुआ समुदाय और महिला वोटरों पर खास फोकस ने भाजपा को बड़ा फायदा पहुंचाया। वहीं Mamata Banerjee की पार्टी TMC का वोट शेयर घटकर 40.8 फीसदी पर पहुंच गया।
‘सोनार बांग्ला’ का सपना हुआ साकार?
भाजपा समर्थकों के मुताबिक शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना उन हजारों कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों की मेहनत का परिणाम है, जिन्होंने दशकों तक बंगाल के गांवों में संगठन को मजबूत किया। भाजपा अब इसे “सोनार बांग्ला” के सपने की शुरुआत बता रही है।