
Narendra Modi ने देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की बचत, सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल और फिलहाल सोना खरीदने से बचने की अपील की है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और महंगे होते कच्चे तेल ने भारत की आर्थिक चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच सरकार अब ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़े कदमों पर जोर दे रही है।
1. बढ़ती तेल कीमतों से बढ़ा दबाव
अमेरिका-इजराइल और Iran के बीच तनाव बढ़ने के बाद कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने से विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव पड़ रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक तेल कंपनियों पर रोजाना 1600 से 1700 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है। फिलहाल इसका पूरा असर आम लोगों तक नहीं पहुंचा है, लेकिन लंबे समय तक स्थिति संभालना आसान नहीं माना जा रहा।
2. रुपये की कमजोरी बनी चिंता
तेल, गैस, फर्टिलाइजर और सोने के आयात के लिए भारत को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। लगातार बढ़ते आयात बिल से रुपये पर दबाव बढ़ रहा है और भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रही है।
इसी वजह से सरकार लोगों से गैर-जरूरी खर्च कम करने और ईंधन बचाने की अपील कर रही है।
3. रिन्यूबल एनर्जी बना बड़ा हथियार
भारत अब तेजी से Solar और Wind Energy की तरफ बढ़ रहा है। देश की कुल बिजली क्षमता में 262.7 गीगावॉट से ज्यादा हिस्सा रिन्यूबल एनर्जी का हो चुका है।
India दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते सोलर मार्केट्स में शामिल हो चुका है। हालांकि सोलर पैनल और कई जरूरी उपकरणों के लिए अभी भी चीन पर निर्भरता बड़ी चुनौती बनी हुई है।
4. EV और चार्जिंग नेटवर्क पर फोकस
2025 में भारत में रिकॉर्ड 23 लाख इलेक्ट्रिक वाहन बिके, लेकिन कुल वाहनों में उनकी हिस्सेदारी अभी सिर्फ 8% है। सरकार EV को भविष्य का बड़ा विकल्प मान रही है, ताकि पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम हो सके।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। चीन और यूरोप की तुलना में भारत अभी काफी पीछे माना जाता है।
संकट ने दिया बड़ा सबक
पश्चिम एशिया संकट ने साफ कर दिया है कि आयात पर ज्यादा निर्भरता भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम बन सकती है। यही वजह है कि सरकार अब ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने, रिन्यूबल एनर्जी बढ़ाने और EV सेक्टर को तेजी से मजबूत करने पर फोकस कर रही है।