
बिहार में भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने के लिए निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य के करीब 200 संदिग्ध अफसरों और कर्मचारियों की डिजिटल फाइल तैयार कर ली गई है। इसके साथ ही मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए एसपी के नेतृत्व में 10 अधिकारियों की विशेष टीम भी बनाई गई है।
निगरानी विभाग का उद्देश्य भ्रष्टाचार के मामलों में सुनवाई की रफ्तार बढ़ाना और दोषियों को जल्द सजा दिलाना है। इसके लिए ब्यूरो अब तकनीक का सहारा ले रहा है, ताकि सबूतों के साथ छेड़छाड़ और सुनवाई में देरी जैसी समस्याओं को कम किया जा सके।
इस दिशा में ओपन टेक्स्ट फॉरेंसिक इमेजर मशीन का इस्तेमाल शुरू किया गया है। करीब 7 लाख रुपये की लागत वाली यह मशीन जब्त किए गए पेन ड्राइव, दस्तावेज और अन्य डिजिटल सबूतों का सटीक क्लोन तैयार करती है। एक बार डेटा इस सिस्टम में सुरक्षित हो जाने के बाद उसमें बदलाव या क्षति की संभावना बेहद कम रह जाती है।
इसी तकनीक की मदद से निगरानी विभाग ने लगभग 200 घूसखोर अफसरों और कर्मियों की विस्तृत प्रोफाइल तैयार की है। इस पूरी प्रक्रिया को संभालने के लिए एक्सपर्ट और टेक्नीशियन्स की विशेष टीम भी तैनात की गई है, जो सबूतों को सुरक्षित रखने और अदालत में पेश करने की प्रक्रिया को मजबूत बना रही है।
मामलों की निगरानी और सुनवाई को तेज करने के लिए एसपी की अगुवाई में विशेष टीम गठित की गई है। इस टीम में डीएसपी, इंस्पेक्टर समेत करीब 10 अधिकारी शामिल हैं। टीम का काम मामलों की लगातार मॉनिटरिंग करना, गवाहों की समय पर पेशी सुनिश्चित करना और सुनवाई में अनावश्यक देरी रोकना है।
जानकारी के अनुसार निगरानी विभाग ने 200 आरोपित अफसरों की सूची भी कोर्ट को सौंप दी है। पिछले 25 वर्षों में पहली बार साल 2025 में सबसे ज्यादा 29 घूसखोर अफसरों और कर्मियों को सजा सुनाई गई थी। इसे निगरानी विभाग की सख्ती और बेहतर समन्वय का नतीजा माना जा रहा है।