पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 नजदीक आते ही सियासी हलचल तेज हो गई है। इस बार सबसे बड़ी चर्चा ‘मुस्लिम वोट बैंक’ को लेकर है, जो लंबे समय से Mamata Banerjee और उनकी पार्टी टीएमसी की सबसे मजबूत ताकत माना जाता रहा है। लेकिन हालिया चुनावी संकेतों ने इस समीकरण को थोड़ा अस्थिर कर दिया है।
सागरदीघी से मिली चेतावनी

मुर्शिदाबाद की सागरदीघी सीट पर उपचुनाव में टीएमसी की हार को एक बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यह सीट मुस्लिम बहुल है और यहां कांग्रेस की जीत ने यह संदेश दिया कि अल्पसंख्यक वोटर अब विकल्प तलाशने लगे हैं। हालांकि बाद में विधायक को टीएमसी में शामिल करा लिया गया, लेकिन वोटरों के मन में उठे सवाल अभी खत्म नहीं हुए हैं।
पड़ोसी राज्यों का असर
बंगाल की राजनीति पर आसपास के राज्यों का असर भी साफ दिख रहा है।
बिहार के सीमांचल इलाके में Asaduddin Owaisi की पार्टी AIMIM ने कांग्रेस और आरजेडी के समीकरण को चुनौती दी है।
असम में Badruddin Ajmal की हार और कांग्रेस की मजबूती ने संकेत दिया कि मुस्लिम वोटर अब ‘विनिंग ऑप्शन’ की तरफ झुक रहे हैं।
महाराष्ट्र के मालेगांव जैसे क्षेत्रों में भी वोटिंग पैटर्न में बदलाव देखा गया है।
इन सबका असर पश्चिम बंगाल में भी महसूस किया जा रहा है।
160 सीटों का बड़ा खेल
बंगाल की कुल 294 विधानसभा सीटों में से करीब 160 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2021 में टीएमसी ने इन सीटों पर शानदार प्रदर्शन किया था, लेकिन इस बार मुकाबला आसान नहीं दिख रहा।
मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, बीरभूम और उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं।
कांग्रेस और ओवैसी का दबाव
टीएमसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस और ओवैसी की बढ़ती सक्रियता है। मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में कांग्रेस अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है, वहीं ओवैसी की एंट्री ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।
भाजपा भी पीछे नहीं
दूसरी ओर Amit Shah की रणनीति के तहत भाजपा भी आक्रामक नजर आ रही है। महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार और घुसपैठ जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया जा रहा है।
2014 में सीमित प्रभाव रखने वाली भाजपा अब लगभग पूरे राज्य में सीधा मुकाबला कर रही है।
क्या बदल जाएगा खेल?
2026 का चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि भरोसे की परीक्षा भी है। मुस्लिम वोट बैंक अगर बिखरता है, तो इसका सीधा असर टीएमसी की सीटों पर पड़ेगा। वहीं विपक्षी दल इसी मौके को भुनाने की कोशिश में हैं।
अब देखना दिलचस्प होगा कि Mamata Banerjee इस चुनौती से कैसे निपटती हैं और क्या वह अपने पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट रख पाती हैं या नहीं।